Monday, May 7, 2007

आरजू

आरजू थी हमें इतना जहक से मौत मिल जाये
सारी दुनियाँ में किसी से तो मोहब्बत मिल जाये
जितेजी पाया ना कुछ हम ने
जमानेवालो, अब जनाजे को तो रुख्सत की इजाजत मिल जाये

पूँछ रहें हैं पूँछनेवाले
लेकिन हम बतलाए क्या
दाग ये दिल ने पाए हैं कैसे
उन को हम समझाए क्या

कितने दाग हैं इस दामन में
कितने दाग हैं माथेपर
जो हम को अपना सकते थे
सच हैं हमें अपनाए क्या

जो अपनों की बस्ती थी
अब नगरी हैं बेगानों की
कौन यहाँ हैं सुननेवाला
दिल की बात सूनाए क्या

पत्थर अब क्या फेंक रहे हो
हम पहले से ही जख्मी हैं
दिल पर कितने जख्म लगे हैं
छोडो तुम्हें गिनवाए क्या

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